09 नवंबर 2013

डा० जगदीश व्योम Dr. Jgdish Vyom

धूप गौरैया
उतरती छज्जे से
आँगन बीच
sparrow sun –
alights from the ledge
into the courtyard



अनाम गंध
बिखेर रही हवा
धान के खेत
the breeze
spreads a nameless scent -
paddy fields



सीली दीवार
सारी रात महकी
अम्मा की याद
damp walls -
fragrant through the night
memories of amma

                  ---- amma – mother




नन्हें वल्बों में
गुम हो गया दिया
तैल-गंध भी
lost amongst
the tiny lights, clay lamps
smell of oil too




उगने लगे
कंकरीट के वन
उदास मन
concrete jungles
sprouting everywhere
doleful soul




मोंगरा फूला
तैर गये सपने
खुली आँखों में
mogra blossoms
how gently, dreams float
in open eyes




टहनी हिला
जाने क्या बतियाते
जंगली पेड़
waving branches
who knows what they talk
… these wild trees



रात सिसकी
दूब ने सजा लिये
सफेद मोती
sighing night
the doob-grass dresses up
in white pearls



युगों से खड़े
ऋषि बरगद जी
बने तपस्वी
since eons
the sage banyan, stands
like an ascetic

-डा० जगदीश व्योम
Dr. Jgdish Vyom

07 अक्तूबर 2013

पत्ता क्या टूटा

पत्ता क्या टूटा ...
दूध के आँसू बहा
सिसका पेड़

-डा० जगदीश व्योम

हाइकु हंस

हाइकु हंस
हौले से हवा हुआ
काँपा शैवाल

-डा० जगदीश व्योम

मोंगरा फूला

मोंगरा फूला
तैर गये सपने
खुली आँखों में

-डा० जगदीश व्योम

धूप गौरैया

धूप गौरैया
उतरती छज्जे से
आँगन बीच

-डा० जगदीश व्योम

क्यों तू उदास

क्यों तू उदास
दूब अभी है जिन्दा
पिक कूकेगा

-डा० जगदीश व्योम

कुछ कम हो

कुछ कम हो
शायद ये कुहासा
यही प्रत्याशा

-डा० जगदीश व्योम

इर्द-गिर्द हैं

इर्द-गिर्द हैं
साँसों वाली मशीने
इंसान कहाँ

-डा० जगदीश व्योम

अनाम गंध

अनाम गंध
बिखेर रही हवा
धान के खेत

-डा० जगदीश व्योम

सीली दीवार

सीली दीवार
सारी रात महकी
अम्मा की याद

-डा० जगदीश व्योम

ओस की बूँद

ओस की बूँद
कैक्टस पर बैठी
शूली पे सन्त

-डा० जगदीश व्योम

टहनी हिला

टहनी हिला
जाने क्या बतियाते
जंगली पेड़

-डा० जगदीश व्योम

नन्हें वल्बों में

नन्हें वल्बों में
गुम हो गया दिया
तैल-गंध भी

-डा० जगदीश व्योम

रात सिसकी

रात सिसकी
दूब ने सजा लिये
सफेद मोती

-डा० जगदीश व्योम

चम्पा बाँटता

चम्पा बाँटता
गंध के अलगोझे
बजाती हवा

-डा० जगदीश व्योम

छिड़ा जो युद्ध

छिड़ा जो युद्ध
रोयेगी मानवता
हँसेंगे गिद्ध

-डा० जगदीश व्योम

वर्षा के दिन

वर्षा के दिन
छतरी ले, आ गये
सेम के बच्चे

-डा० जगदीश व्योम

05 अप्रैल 2012

गन्ध के बोरे

गन्ध के बोरे
लाता है ढो-ढोकर
हवा का घोड़ा।


-डा० जगदीश व्योम

युगों से खड़े

युगों से खड़े
ऋषि बरगद जी
बने तपस्वी।


-डा० जगदीश व्योम

साँझ होते ही

साँझ होते ही
बैठता आसन पे
ऋषि सूरज।


-डा० जगदीश व्योम

गुस्सैल नभ

गुस्सैल नभ
दिखाता लाल आँखें
रोता बादल।


-डा० जगदीश व्योम

रोज ले आती

रोज ले आती
गौरैया घास-फूस
फेंक देती माँ।


-डा० जगदीश व्योम

पीटता नभ

पीटता नभ
बिजली के कोढ़े से
रोता बादल।


-डा० जगदीश व्योम

खेत की मेड़

खेत की मेड़
सिसके चुपचाप
छिला वदन।


-डा० जगदीश व्योम

गौरैया आती

गौरैया आती
सिखाती कितनों को
अन्दाज़ नया।


-डा० जगदीश व्योम

थका सूरज

थका सूरज
ढहा देगा फिर भी
तम का दुर्ग।


-डा० जगदीश व्योम

गोद में बैठा

गोद में बैठा
सूरज खरगोश
उछल भागा।


-डा० जगदीश व्योम

मुढ़ैठा बाँधे

मुढ़ैठा बाँधे
अकड़ा खड़ा चना
माटी का बेटा।


-डा० जगदीश व्योम

निगल गई

निगल गई
सदियों का सृजन
क्रोधित धरा।


-डा० जगदीश व्योम

बूढ़ा सूरज

बूढ़ा सूरज
झेलेगा कब तक
तम के दंश।


-डा० जगदीश व्योम

पतंग उड़ी

पतंग उड़ी
डोर कटी, बिछुड़ी
फिर न मिली।


-डा० जगदीश व्योम

यूँ ही न बहो

यूँ ही न बहो
पर्वत-सा ठहरो
मन की कहो।


-डा० जगदीश व्योम

मैं न बोलूँगा

मैं न बोलूँगा
बोलेंगी कविताएँ
व्यथा मन की।


-डा० जगदीश व्योम

सूर्य के पाँव

सूर्य के पाँव
चूमकर सो गए
गाँव के गाँव।


-डा० जगदीश व्योम

चींटी बने हो

चींटी बने हो
रौंदे तो जाओगे ही
रोना-धोना क्यों ?


-डा० जगदीश व्योम

बिना धूरी की

बिना धूरी की
घूम रही है चक्की
पिसेंगे सब।


-डा० जगदीश व्योम

मिलने भी दो

मिलने भी दो
राम और ईसा को
भिन्न हैं कहाँ।


-डा० जगदीश व्योम

मेघ उमड़े

मेघ उमड़े
धरती भी उमगी
फसल उगी।


-डा० जगदीश व्योम

सहम गई

सहम गई
फुदकती गौरैया
शुभ नहीं ये।


-डा० जगदीश व्योम

मरने न दो

मरने न दो
परंपराएँ कभी
बचोगे तभी।


-डा० जगदीश व्योम

नहीं पनपा

नहीं पनपा
बरगदी छाँव में
कभी पादप।

-डा० जगदीश व्योम

उगने लगे

उगने लगे
कंकरीट के वन
उदास मन।

-डा० जगदीश व्योम

धूप के पाँव

धूप के पाँव
थके अनमने से
बैठे सहमे।

-डा० जगदीश व्योम

ताप से जूझा

ताप से जूझा
पा गया सुर्ख रंग
टीले का टेसू ।

-डा० जगदीश व्योम

20 मई 2011